धान की खेती करने वाले हमारे किसान भाइयों के सामने हर साल दो सबसे बड़ी चुनौतियां आकर खड़ी हो जाती हैं। पहली समस्या—ब्लाइट (झुलसा रोग) और ब्लास्ट (झोंका रोग) जैसी खतरनाक बीमारियां जो पूरी फसल को रातों-रात तबाह कर देती हैं। दूसरी समस्या—खेती की बढ़ती लागत और मंडियों में बासमती का सही दाम न मिलना। अगर आप भी इस सीजन में पारंपरिक धान लगाकर अपनी रातों की नींद खराब नहीं करना चाहते, तो पूसा संस्थान (IARI) का एक नया चमत्कार आपकी किस्मत बदल सकता है।
हम बात कर रहे हैं PB 1885 Dhan Variety (Pusa Basmati 1885) की। यह कोई साधारण धान नहीं है, बल्कि भारत के सबसे मशहूर बासमती धान ‘पूसा बासमती 1121’ का एक ऐसा अपग्रेड है, जिसमें बीमारियों से लड़ने की इनबिल्ट ताकत है। इस विस्तृत गाइड में हम इस वैरायटी की ए से लेकर जेड तक पूरी जन्मकुंडली खंगालेंगे ताकि आप इस सीजन में सही फैसला लेकर अपनी कमाई को दोगुना कर सकें।
पूसा बासमती 1885 क्या है और इसे क्यों बनाया गया?
सरल शब्दों में कहें तो PB 1885 Dhan Variety पूसा बासमती 1121 का ही सुधरा हुआ रूप है। पूसा 1121 ने अपने लंबे दानों और बेहतरीन खुशबू के दम पर सालों तक अंतरराष्ट्रीय बाजार पर राज किया है। लेकिन पिछले कुछ सालों में इसमें दो गंभीर बीमारियां देखने को मिलीं—बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट (Bacterial Leaf Blight – BLB) और ब्लास्ट (Blast Disease)। इन बीमारियों के इलाज में किसानों का हजारों रुपया महंगी कीटनाशकों और फंगिसाइड्स पर खर्च हो जाता था, जिससे मुनाफा आधा रह जाता था।
इसी समस्या को जड़ से खत्म करने के लिए वैज्ञानिकों ने ‘मार्कर असिस्टेड सिलेक्शन’ तकनीक का इस्तेमाल किया। उन्होंने पूसा 1121 के डीएनए में थोड़ा सुधार करके उसमें बीमारियों से लड़ने वाले जीन डाल दिए। इसके बाद जो नई वैरायटी तैयार हुई, उसे नाम दिया गया पूसा बासमती 1885।
इस वैरायटी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह बिना किसी अतिरिक्त कीटनाशक के खर्चे के, फसल को झुलसा और झोंका रोग से पूरी तरह सुरक्षित रखती है। यानी आपकी फसल हरी-भरी रहेगी और दवाइयों का खर्च सीधे आपकी जेब में बचेगा।
PB 1885 Dhan Variety की मुख्य विशेषताएं और खूबियां
जब आप बाजार में कोई बीज खरीदने जाते हैं, तो सबसे पहले उसके फीचर्स देखते हैं। पूसा बासमती 1885 में कुछ ऐसे लाजवाब गुण हैं जो इसे इस साल की सबसे हॉट वैरायटी बनाते हैं। आइए इसके मुख्य पहलुओं को विस्तार से समझते हैं।
1. फसल पकने की अवधि (Maturity Period)
यह किस्म मध्यम समय में पककर तैयार होने वाली वैरायटी है। नर्सरी में बीज बोने से लेकर फसल की कटाई तक इसमें कुल 135 से 140 दिन का समय लगता है। इसका मतलब यह हुआ कि अगर आप जून के महीने में इसकी नर्सरी तैयार करते हैं, तो अक्टूबर के आखिरी या नवंबर के शुरुआती हफ्ते तक आपका खेत पूरी तरह खाली हो जाएगा। इसके बाद आप समय पर गेहूं या अन्य रबी फसलों की बुवाई बिना किसी देरी के कर सकते हैं।
2. पौधे की ऊंचाई और तने की मजबूती
इस वैरायटी के पौधे की औसत ऊंचाई लगभग 115 से 120 सेंटीमीटर तक होती है। कई बार किसान भाई डरते हैं कि लंबा पौधा होने के कारण फसल तेज हवा या बारिश में गिर जाएगी। लेकिन वैज्ञानिकों ने इस बात का पूरा ध्यान रखा है। पूसा 1885 का तना बेहद मजबूत और लचीला होता है। तेज हवाएं चलने पर भी यह आसानी से खेत में खड़ी रहती है, जिससे कटाई के समय नुकसान न के बराबर होता है।
3. चावल की क्वालिटी और दानों की लंबाई
बासमती की असली पहचान उसके दानों की लंबाई और पकने के बाद की खुशबू से होती है। इस मामले में PB 1885 Dhan Variety अपने पैरेंट (पूसा 1121) से बिल्कुल भी पीछे नहीं है।
- इसका दाना अत्यधिक लंबा, पतला और चमकदार होता है।
- पकने के बाद इसके चावल आपस में चिपकते नहीं हैं, बल्कि खिले-खिले रहते हैं।
- इसमें वही पारंपरिक बासमती वाली सौंधी खुशबू होती है, जिसकी मांग अरब देशों और यूरोपियन मार्केट में सबसे ज्यादा है।
पैदावार का पूरा गणित: कितनी मिलेगी उपज?
खेती में चाहे कितनी भी खूबियां क्यों न हों, जब तक पैदावार बंपर न मिले, किसान संतुष्ट नहीं होता। पूसा बासमती 1885 इस मोर्चे पर भी आपको बिल्कुल निराश नहीं करेगी।
अगर आप वैज्ञानिक तरीके से और सही खादों का संतुलन बनाकर इसकी खेती करते हैं, तो इसकी औसत पैदावार 20 से 24 क्विंटल प्रति एकड़ (लगभग 50 से 60 क्विंटल प्रति हेक्टेयर) तक आराम से मिल जाती है।
तुलना के लिए नीचे दी गई तालिका को देखें, जिससे आपको समझ आएगा कि यह वैरायटी दूसरी पुरानी बासमती किस्मों के मुकाबले कितनी बेहतर है:
| धान की वैरायटी (Rice Variety) | पकने का समय (दिन) | औसत पैदावार (प्रति एकड़) | प्रमुख रोग प्रतिरोधकता (Disease Resistance) |
| पूसा बासमती 1885 (PB 1885) | 135 – 140 दिन | 20 – 24 क्विंटल | लीफ ब्लाइट और ब्लास्ट से 100% सुरक्षित |
| पूसा बासमती 1121 | 140 – 145 दिन | 18 – 20 क्विंटल | बीमारियों के प्रति बहुत संवेदनशील |
| पूसा बासमती 1509 | 115 – 120 दिन | 22 – 25 क्विंटल | झुलसा रोग का खतरा बना रहता है |
| पूसा बासमती 1401 | 150 – 155 दिन | 22 – 24 क्विंटल | पकने में ज्यादा समय लेती है |
इस टेबल से साफ है कि PB 1885 कम समय और कम लागत में पुरानी 1121 वैरायटी के मुकाबले 2 से 4 क्विंटल प्रति एकड़ ज्यादा मुनाफा देने की क्षमता रखती है।
बीमारियों से सुरक्षा: किसान का असली पैसा बचाने वाला फीचर
जैसा कि हमने शुरुआत में बताया, इस धान को बनाने का असली मकसद दवाइयों का खर्च कम करना था। पूसा बासमती 1885 में दो सबसे खतरनाक बीमारियों के खिलाफ इनबिल्ट रेजिस्टेंस (प्रतिरोधक क्षमता) पाई जाती है:
बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट (Bacterial Leaf Blight – BLB)
इस रोग में धान की पत्तियां ऊपर से सूखने लगती हैं और उन पर पीले-भूरे रंग की धारियां बन जाती हैं। धीरे-धीरे पूरी फसल सूखी घास जैसी दिखने लगती है। पूसा 1885 के अंदर xa21 और xa13 जैसे मजबूत जीन डाले गए हैं, जो इस बैक्टीरिया को पौधे पर हावी ही नहीं होने देते।
ब्लास्ट या झोंका रोग (Rice Blast)
यह एक फंगल बीमारी है जिसमें पत्तियों और तने की गांठों पर नाव के आकार के गहरे धब्बे बन जाते हैं, जिससे बालियां टूटकर गिर जाती हैं। इस वैरायटी में Pi54 और Piz5 जीन मौजूद हैं, जो ब्लास्ट फंगस के खिलाफ एक सुरक्षा कवच की तरह काम करते हैं।
काम की बात: इन जीनों की मौजूदगी के कारण आपको खेत में स्ट्रेप्टोसाइक्लिन, कॉपर ऑक्सीक्लोराइड या महंगे फंगिसाइड्स का छिड़काव करने की जरूरत नहीं पड़ती। इससे प्रति एकड़ लगभग ₹2,000 से ₹3,500 की सीधी बचत होती है।
PB 1885 की वैज्ञानिक खेती कैसे करें? स्टेप-बाय-स्टेप गाइड
अधिकतम पैदावार लेने के लिए सिर्फ अच्छा बीज होना काफी नहीं है, बल्कि सही समय पर सही प्रबंधन भी जरूरी है। नीचे दिए गए स्टेप्स को ध्यान से पढ़ें और इस सीजन में इसी तरह से काम करें।
स्टेप 1: नर्सरी (पनीरी) की तैयारी और सही समय
- सही समय: पूसा 1885 की नर्सरी लगाने का सबसे सही समय 20 मई से 15 जून के बीच का होता है।
- बीज की मात्रा: एक एकड़ खेत की रोपाई के लिए आपको लगभग 5 से 6 किलोग्राम साफ और प्रमाणित बीज की आवश्यकता होगी।
- बीज शोधन (Seed Treatment): बोने से पहले बीज को 10 लीटर पानी में 20 ग्राम बाविस्टिन और 2 ग्राम स्ट्रेप्टोसाइक्लिन मिलाकर करीब 12 से 15 घंटे के लिए भिगोकर रख दें। इससे शुरुआती बीमारियों का खतरा बिल्कुल खत्म हो जाता है।
स्टेप 2: मुख्य खेत की तैयारी और रोपाई
- जब आपकी नर्सरी के पौधे 21 से 25 दिन के हो जाएं (यानी पौधों में 4-5 पत्तियां आ जाएं), तब उनकी रोपाई मुख्य खेत में कर देनी चाहिए। ज्यादा पुरानी पनीरी लगाने से कल्ले (Tillers) कम फूटते हैं।
- रोपाई करते समय पौधे से पौधे की दूरी 15 सेंटीमीटर और लाइन से लाइन की दूरी 20 सेंटीमीटर रखनी चाहिए।
- एक जगह पर केवल 2 से 3 पौधे ही लगाएं। ज्यादा गहरे में रोपाई न करें, पौधे को सिर्फ 2-3 सेंटीमीटर गहरा ही गाड़ें।
स्टेप 3: खाद और उर्वरक का सही तालमेल (Fertilizer Management)
बासमती धान में बहुत ज्यादा यूरिया डालने से बचना चाहिए, क्योंकि इससे पौधे की लंबाई जरूरत से ज्यादा बढ़ जाती है और दानों की क्वालिटी खराब हो जाती है। एक एकड़ के लिए नीचे दिया गया चार्ट सबसे बेस्ट है:
- खेत की तैयारी के समय: 1 बैग सिंगल सुपर फास्फेट (SSP), 25 किलो म्युरिएट ऑफ पोटाश (MOP) और 10 किलो जिंक सल्फेट (21%) डालें।
- रोपाई के 20-25 दिन बाद (पहला कल्ला फूटते समय): 30 से 35 किलो यूरिया के साथ 5 किलो जाइम मिलाकर बिखेरें।
- रोपाई के 40-45 दिन बाद: दोबारा 30-35 किलो यूरिया का दूसरा डोज दें। इसके बाद यूरिया का इस्तेमाल बंद कर दें।
खेती के दौरान आम गलतियां जिनसे आपको बचना है
हमारे कई किसान भाई अनजाने में कुछ ऐसी गलतियां कर बैठते हैं जिससे बंपर पैदावार देने वाली वैरायटी भी फेल हो जाती है। आपको इन बातों का विशेष ध्यान रखना है:
- यूरिया का ओवरडोज: कई किसान सोचते हैं कि ज्यादा यूरिया डालने से फसल ज्यादा हरी होगी और पैदावार बढ़ेगी। लेकिन पूसा 1885 में ज्यादा यूरिया डालने से कीटों (जैसे हॉपर या तेला) का हमला बढ़ सकता है।
- देरी से कटाई: जब खेत में 90% बालियां सुनहरी हो जाएं, तब सिंचाई बंद कर दें और फसल की कटाई कर लें। दानों को खेत में ज्यादा सूखने देने से मिलिंग के समय चावल टूट जाता है।
- पानी का गलत प्रबंधन: रोपाई के शुरुआती 15 दिनों तक खेत में 2-3 इंच पानी जमा रहना चाहिए। लेकिन कल्ले फूटने के बाद और दाना पकने के समय खेत में सिर्फ नमी होनी चाहिए, पानी ठहरा हुआ नहीं रहना चाहिए।
निष्कर्ष: क्या आपको पूसा बासमती 1885 लगाना चाहिए?
अगर हम पूरी बात का निचोड़ निकालें, तो PB 1885 Dhan Variety उन किसानों के लिए एक वरदान है जो पूसा 1121 जैसी प्रीमियम क्वालिटी का चावल तो चाहते हैं, लेकिन बीमारियों और दवाइयों के भारी-भरकम खर्च से तंग आ चुके हैं। यह किस्म न सिर्फ पर्यावरण के अनुकूल है (क्योंकि इसमें केमिकल का छिड़काव कम होता है), बल्कि यह आपके शुद्ध मुनाफे को सीधे तौर पर बढ़ाती है। कम लागत में 22 क्विंटल तक की शानदार पैदावार और अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी भारी मांग को देखते हुए, इस सीजन में आपको अपने खेत के एक बड़े हिस्से में इसे जरूर जगह देनी चाहिए।
आपका अगला कदम (Call to Action): इस सीजन में नकली बीजों के धोखे से बचें। पूसा बासमती 1885 का असली और प्रमाणित बीज केवल सरकारी कृषि केंद्रों, कृषि विज्ञान केंद्रों (KVK) या प्रतिष्ठित बीज डीलरों से ही खरीदें। अभी अपने नजदीकी केंद्र पर जाएं और समय रहते बीज की बुकिंग करें ताकि सही समय पर नर्सरी तैयार की जा सके।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q1. क्या पूसा बासमती 1885 का चावल खाने और बेचने में पूसा 1121 जैसा ही है?
जवाब: हां, बिल्कुल। इसके दानों की लंबाई, खुशबू और स्वाद हुबहू पूसा 1121 जैसा ही है। मंडियों में इसका भाव भी पूसा 1121 के बराबर या उससे बेहतर ही मिलता है।
Q2. क्या इस वैरायटी में बिल्कुल भी बीमारी नहीं आती?
जवाब: पूसा 1885 मुख्य रूप से बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट (झुलसा) और ब्लास्ट (झोंका) रोग के प्रति पूरी तरह प्रतिरोधी है। हालांकि, तना छेदक (Stem Borer) या शीट ब्लाइट जैसी अन्य आम समस्याओं के लिए फसल की निगरानी करते रहें और जरूरत पड़ने पर ही हल्की दवा का छिड़काव करें।
Q3. PB 1885 धान की खेती किन-किन राज्यों में की जा सकती है?
जवाब: यह किस्म मुख्य रूप से भारत के पारंपरिक बासमती उत्पादक क्षेत्रों जैसे पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली और जम्मू-कश्मीर के लिए सबसे ज्यादा उपयुक्त मानी गई है।
Q4. इस धान की कटाई के समय दानों में कितनी नमी होनी चाहिए?
जवाब: जब आप फसल की मड़ाई (Threshing) कर रहे हों, तो दानों में नमी का स्तर 14% से 15% के बीच होना चाहिए। इससे चावल भंडारण के समय खराब नहीं होता और मिलिंग में टूटता भी नहीं है।












