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PR 126 धान की खेती: कम समय में बंपर पैदावार और अंधाधुंध कमाई का पूरा सच

धान की खेती में सबसे बड़ी समस्या पानी की कमी, बढ़ता खर्च और फसलों में लगने वाली बीमारियां हैं। जब किसान भाई पारंपरिक और लंबी अवधि वाली धान की किस्में लगाते हैं, तो खेत लंबे समय तक व्यस्त रहता है। इसका सीधा असर यह होता है कि अगली फसल, जैसे गेहूं या आलू की बुवाई में देरी हो जाती है। देर से बुवाई करने के कारण गेहूं की पैदावार घट जाती है और किसानों को दोहरा नुकसान झेलना पड़ता है। इसके अलावा, पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में पराली प्रबंधन (Stubble Management) के लिए बहुत कम समय बचता है, जिससे प्रदूषण और सरकारी सख्ती दोनों का सामना करना पड़ता है।

अगर आप भी इस चक्रव्यूह से परेशान हैं, तो PR 126 Paddy (पीआर 126 धान) आपके लिए एक वरदान साबित हो सकती है। इस विस्तृत गाइड को पढ़ने के बाद आपको समझ आएगा कि कैसे आप कम पानी, कम लागत और बेहद कम समय में धान की रिकॉर्ड तोड़ पैदावार ले सकते हैं। हम मिट्टी की तैयारी से लेकर बाजार भाव और मुनाफे तक के हर उस पहलू पर बात करेंगे जो मेरे व्यक्तिगत अनुभव और कृषि वैज्ञानिकों की सिफारिशों पर आधारित है।

PR 126 Paddy (पीआर 126 धान) क्या है और यह क्यों खास है?

PR 126 Paddy पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी (PAU) द्वारा विकसित की गई धान की एक क्रांतिकारी और कम अवधि वाली उन्नत किस्म है। इसे मुख्य रूप से पानी की बचत करने और किसानों को अगली फसल के लिए पर्याप्त समय देने के उद्देश्य से तैयार किया गया है।

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यह किस्म क्यों जरूरी है?

अक्सर देखा गया है कि लंबी अवधि की किस्में (जैसे पूसा 44) लगभग 140 से 150 दिन का समय लेती हैं। इसके विपरीत, पीआर 126 किस्म नर्सरी की रोपाई के बाद मात्र 93 से 95 दिनों में पककर पूरी तरह तैयार हो जाती है। अगर इसमें नर्सरी के 25 से 30 दिन भी जोड़ दिए जाएं, तो बीज से लेकर कटाई तक का कुल सफर लगभग 120 से 125 दिनों का होता है। कम समय लेने के कारण इस किस्म में सिंचाई के 3 से 4 फेरे कम करने पड़ते हैं, जिससे डीजल और बिजली का खर्च सीधे तौर पर बच जाता है।

मिट्टी, जलवायु और बुवाई का सही समय (सीजन 2026)

पीआर 126 धान की खेती के लिए सही समय और सही माहौल का चुनाव करना ही आपकी आधी सफलता तय कर देता है। वर्ष 2026 के बदलते मौसम के मिजाज को देखते हुए कृषि विशेषज्ञों ने इसके समय को लेकर कुछ खास दिशा-निर्देश जारी किए हैं।

मिट्टी का चयन

यह किस्म हर प्रकार की उपजाऊ मिट्टी में अच्छी पैदावार देती है। हालांकि, मटियार दोमट (Clay Loam) और भारी मिट्टी इसके लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है। इसमें पानी रोकने की क्षमता अच्छी होती है। हल्की रेतीली मिट्टी में इसे लगाने से बचें, क्योंकि वहां पोषक तत्वों और पानी की कमी के कारण पौधे पीले पड़ सकते हैं।

जलवायु और तापमान

धान की इस किस्म को पकने के समय शुष्क और साफ मौसम की आवश्यकता होती है। सितंबर के आखिरी या अक्टूबर के शुरुआती हफ्तों में जब तापमान थोड़ा कम होने लगता है, तब इसकी कटाई बड़े आराम से हो जाती है।

बुवाई और रोपाई का सही समय

कई किसानों की यही गलती होती है कि वे अधिक पैदावार के चक्कर में पीआर 126 की रोपाई बहुत जल्दी (जून के पहले या दूसरे हफ्ते में) कर देते हैं। मेरे अनुभव में, अगर आप इसकी रोपाई बहुत जल्दी करेंगे, तो फसल समय से पहले पक जाएगी और उस समय होने वाली मानसूनी बारिश या तेज धूप के कारण चावल के दाने टूट सकते हैं और उनकी चमक फीकी पड़ सकती है।

  • नर्सरी (पनीरी) डालने का समय: 15 मई से 15 जून तक।
  • खेत में रोपाई (Transplanting) का सही समय: 15 जून से 10 जुलाई तक।

बीज की मात्रा और वैज्ञानिक तरीके से नर्सरी प्रबंधन

बेहतर जमाव और स्वस्थ पौधों के लिए आपको हमेशा प्रमाणित (Certified) बीजों का ही उपयोग करना चाहिए।

बीज की मात्रा

एक एकड़ खेत की रोपाई के लिए 6 से 8 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है।

बीज उपचार (Seed Treatment) – सबसे जरूरी कदम

फसल को शुरुआती बीमारियों और जड़ गलन से बचाने के लिए बीज उपचार अनिवार्य है।

  1. 10 लीटर पानी में 10 ग्राम कार्बेन्डाजिम (Carbendazim) और 1 ग्राम स्ट्रेप्टोसाइक्लिन (Streptocycline) घोलें।
  2. इस घोल में 6-8 किलो बीज को 12 से 15 घंटे के लिए भिगोकर रख दें।
  3. इसके बाद बीज को निकाल कर जूट के बोरे पर छाया में सुखाएं और जब उसमें अंकुरण (Sprout) दिखने लगे, तब नर्सरी में बुवाई करें।

नर्सरी की तैयारी और देखभाल

नर्सरी के लिए चुने गए खेत में अच्छी मात्रा में सड़ी हुई गोबर की खाद मिलाएं। पानी भरकर मिट्टी को अच्छी तरह से मथ लें (puddling)। बीज बोने के बाद ध्यान रखें कि पनीरी में नमी बनी रहे लेकिन पानी बहुत ज्यादा जमा न हो। 25 से 30 दिन की नर्सरी मुख्य खेत में रोपाई के लिए पूरी तरह तैयार हो जाती है। इससे बड़ी पनीरी लगाने पर पौधों का फुटाव (Tillering) कम हो जाता है।

मुख्य खेत की तैयारी और रोपाई की सही विधि

खेत की तैयारी

सबसे पहले खेत की गहरी जुताई करें ताकि मिट्टी धूप के संपर्क में आ सके। इसके बाद खेत में पानी भरकर कद्दू (Puddling) करें। कद्दू करने से मिट्टी के महीन कण नीचे बैठ जाते हैं, जिससे पानी का रिसाव कम होता है और खेत में लंबे समय तक नमी बनी रहती है। आखिरी जुताई के समय लेजर लैंड लेवलर की मदद से खेत को पूरी तरह समतल कर लें ताकि पानी पूरे खेत में एक समान फैले।

रोपाई का तरीका (Planting Distance)

रोपाई करते समय कतार से कतार और पौधे से पौधे की दूरी का विशेष ध्यान रखें:

  • लाइन से लाइन की दूरी: 20 सेंटीमीटर
  • पौधे से पौधे की दूरी: 15 सेंटीमीटर
  • प्रति हिल (स्थान) पौधों की संख्या: एक जगह पर 2 से 3 स्वस्थ पौधे जरूर लगाएं।

विशेष नोट: एक एकड़ में कम से कम 33 से 36 हजार हिल (पौधों के गुच्छे) होने चाहिए। अगर पौधों की संख्या कम रहेगी, तो चाहे आप कितनी भी खाद डाल लें, अंतिम उत्पादन घट जाएगा।

खाद और उर्वरक प्रबंधन (Fertilizer Management)

पीआर 126 धान कम समय की किस्म है, इसलिए इसे पोषक तत्वों की जरूरत तुरंत और सही समय पर होती है। देरी से दी गई खाद का फसल को कोई लाभ नहीं मिलता।

उर्वरक का नामप्रति एकड़ मात्रादेने का सही समय
यूरिया (Urea)90 से 100 किलोग्रामतीन बराबर किश्तों में (रोपाई के समय, 21 दिन पर, और 42 दिन पर)
डीएपी (DAP)30 से 35 किलोग्रामआखिरी जुताई या रोपाई के समय (Basal Dose)
म्यूरेट ऑफ पोटाश (MOP)20 किलोग्रामरोपाई के समय
जिंक सल्फेट (Zinc Sulphate 21%)10 से 15 किलोग्रामरोपाई के 10 से 15 दिनों के भीतर

चेतावनी: रोपाई के 45 दिनों के बाद खेत में नाइट्रोजन (यूरिया) का प्रयोग बिल्कुल बंद कर दें। इसके बाद यूरिया डालने से पत्तों का आकार जरूरत से ज्यादा बढ़ जाता है, जिससे कीड़े और बीमारियों का हमला तेज हो जाता है।

सिंचाई और जल प्रबंधन: पानी की बचत का गणित

अक्सर किसानों के मन में यह भ्रम होता है कि धान के खेत में हमेशा घुटनों तक पानी भरा रहना चाहिए। लेकिन पीआर 126 के मामले में ऐसा नहीं है।

  1. शुरुआती 15 दिन: रोपाई के बाद पहले दो हफ्तों तक खेत में 2 से 3 इंच पानी बनाकर रखना जरूरी है ताकि पौधे जमीन में अपनी पकड़ बना सकें।
  2. वैकल्पिक सुखाना (Alternate Wetting and Drying): 15 दिनों के बाद खेत में पानी तभी लगाएं जब पहले से भरा हुआ पानी जमीन सोख ले और मिट्टी की ऊपरी सतह पर हल्की दरारें दिखने लगें। इस विधि से जड़ों को ऑक्सीजन मिलती है और कल्ले (Tillers) बहुत शानदार निकलते हैं।
  3. फूल आते समय (Flowering Stage): जब फसल में बालियां निकल रही हों (G parenting stage), उस समय खेत में सूखा नहीं पड़ना चाहिए। इस दौरान नमी का स्तर बनाए रखना दानों के भराव के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

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खरपतवार नियंत्रण (Weed Control)

कम अवधि की फसलों में खरपतवार पोषक तत्वों को तेजी से सोख लेते हैं, जिससे मुख्य फसल कमजोर हो जाती है।

  • रासायनिक नियंत्रण: रोपाई के 2 से 5 दिनों के भीतर Pretilachlor (प्रिटिलाक्लोरो) 500 मिलीलीटर या Butachlor (ब्यूटाक्लोर) 1 लीटर प्रति एकड़ की दर से 60 किलो सूखी रेत में मिलाकर खड़े पानी में समान रूप से बिखेर दें। इस दौरान खेत में पानी का स्तर बना रहना चाहिए।
  • खड़ी फसल में नियंत्रण: यदि रोपाई के 15-20 दिन बाद चौड़ी पत्ती या घास वाले खरपतवार दिखाई दें, तो Bispyribac Sodium (बिस्पायरीबैक सोडियम 10% SC) की 80 मिलीलीटर मात्रा को 150 लीटर पानी में घोलकर स्प्रे करें। स्प्रे करने से पहले खेत का पानी निकाल दें और स्प्रे के 24 घंटे बाद दोबारा पानी भरें।

रोग एवं कीट प्रबंधन (Disease and Pest Management)

PR 126 की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह पारंपरिक किस्मों की तुलना में बीमारियों के प्रति काफी सहनशील है। फिर भी, मौसम के उतार-चढ़ाव के कारण कुछ कीड़े और बीमारियां आ सकती हैं।

1. तना छेदक (Stem Borer)

  • लक्षण: सूंडियां तने के अंदर घुसकर उसे खा जाती हैं, जिससे बीच की पत्ती सूख जाती है जिसे ‘डेड हार्ट’ कहते हैं। बालियां आने पर वे सफेद और खाली रह जाती हैं।
  • उपाय: रोपाई के 25-30 दिन पर Cartap Hydrochloride 4G (कार्टाप हाइड्रोक्लोराइड) 7-8 किलो प्रति एकड़ की दर से डालें या Chlorantraniliprole (कोराजन) 60 मिलीलीटर प्रति एकड़ की दर से स्प्रे करें।

2. भूरा पत्ती लपेटक (Leaf Folder)

  • लक्षण: सूंडी पत्ती को दोनों किनारों से मोड़कर अंदर से हरा हिस्सा खुरच कर खाती है, जिससे पत्तियों पर सफेद धारियां बन जाती हैं।
  • उपाय: आर्थिक नुकसान की सीमा (ETL) पार होने पर Flubendiamide (फेम) 20 मिलीलीटर प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करें।

3. गर्दन तोड़ / झुलसा रोग (Blast / Sheath Blight)

  • लक्षण: पत्तियों पर नाव के आकार के धब्बे बनते हैं और बालियों के नीचे की गांठ काली होकर टूट जाती है।
  • उपाय: रोग के शुरुआती लक्षण दिखते ही Hexaconazole 5% EC 200 मिलीलीटर या Tebuconazole + Trifloxystrobin (नेटिवो) 80 ग्राम प्रति एकड़ की दर से 150 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।

उत्पादन क्षमता, लागत और कमाई का पूरा गणित (Yield & Profit Dynamic)

यह आंकड़ा क्षेत्र, मौसम, प्रबंधन और बाजार की स्थिति के अनुसार बदल सकता है। यहाँ हम एक अनुमानित और व्यावहारिक गणना प्रस्तुत कर रहे हैं।

लागत (Cost of Cultivation)

कम समय की फसल होने के कारण इसमें दवाओं, खादों और मुख्य रूप से सिंचाई (डीजल/बिजली) पर होने वाला खर्च काफी कम होता है। एक एकड़ में पनीरी, जुताई, रोपाई, खाद, दवा और कटाई मिलाकर कुल खर्च लगभग ₹15,000 से ₹18,000 के बीच आता है।

उत्पादन क्षमता (Yield Range)

अगर वैज्ञानिक तरीके से देखरेख की जाए, तो PR 126 का औसत उत्पादन 26 से 32 क्विंटल प्रति एकड़ तक बड़े आराम से मिल जाता है। कुछ प्रगतिशील किसानों ने सही प्रबंधन से इसका उत्पादन 34 क्विंटल तक भी दर्ज किया है।

बाजार भाव और शुद्ध मुनाफा (Profit Analysis)

यदि हम सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) या मंडी के सामान्य भाव को औसतन ₹2,100 से ₹2,400 प्रति क्विंटल भी मानें:

  • कुल आय (औसत 28 क्विंटल): 28 × ₹2,200 = ₹61,600
  • शुद्ध लाभ: ₹61,600 – ₹16,000 (लागत) = लगभग ₹45,600 प्रति एकड़

इसके अतिरिक्त, इस किस्म की कटाई सितंबर के अंत में हो जाती है, जिससे किसान भाई आलू, मटर या अगेती गेहूं की फसल लगाकर एक अतिरिक्त कमाई का जरिया (Extra Income Window) खोल लेते हैं।

तुलनात्मक तालिका: PR 126 बनाम अन्य लंबी अवधि की किस्में

फसलों के चयन को आसान बनाने के लिए नीचे दी गई तालिका को ध्यान से देखें:

विशेषताएंPR 126 Paddy (उन्नत किस्म)पारंपरिक किस्में (जैसे पूसा 44 / पीआर 118)
पकने की अवधि120 – 125 दिन (बीज से कटाई)145 – 160 दिन
कुल सिंचाई की आवश्यकता18 – 22 बार26 – 30 बार
बीमारियों का प्रकोपबहुत कम (सहनशील)अधिक (विशेषकर ब्लास्ट और झुलसा)
प्रति एकड़ औसत लागत₹15,000 – ₹18,000₹22,000 – ₹25,000
औसत पैदावार (प्रति एकड़)26 – 32 क्विंटल28 – 34 क्विंटल
अगली फसल के लिए समय30 – 40 दिन का अतिरिक्त समय मिलता हैसमय की भारी कमी, गेहूं की बुवाई में देरी
पराली प्रबंधनबेहद आसान (खेत खाली रहता है)मुश्किल (मशीनों की उपलब्धता की समस्या)

किसानों की 5 आम गलतियां और उनके नुकसान

अक्सर हमारे किसान भाई जाने-अनजाने में कुछ ऐसी गलतियां कर बैठते हैं जिससे इस बेहतरीन किस्म से भी पूरा उत्पादन नहीं मिल पाता:

  1. समय से पहले नर्सरी डालना: मई के पहले हफ्ते में नर्सरी डालने से फसल अगस्त के अंत में पक जाती है। उस समय तेज गर्मी और बारिश से दाने बदरंग हो जाते हैं और मिलिंग के समय चावल टूट जाता है।
  2. ओवर-एज नर्सरी की रोपाई: जब पनीरी 40-45 दिन की हो जाती है, तब उसकी रोपाई करने से पौधों में कल्लों का फुटाव रुक जाता है। हमेशा 25 से 30 दिन की पनीरी ही लगाएं।
  3. यूरिया का अत्यधिक और देर से प्रयोग: रोपाई के 50 दिन बाद भी यूरिया डालते रहने से पौधा बहुत लंबा और कमजोर हो जाता है, जिससे हवा चलने पर फसल गिर (Lodging) जाती है।
  4. पौधों की कम संख्या: कद्दू किए हुए खेत में मजदूर अक्सर दूर-दूर पौधे लगा देते हैं। अगर प्रति एकड़ पौधों की संख्या कम होगी, तो कुल पैदावार सीधे तौर पर घट जाएगी।
  5. कटाई में देरी करना: पीआर 126 के पकते ही इसकी तुरंत कटाई कर लेनी चाहिए। यदि पकी हुई फसल को खेत में ज्यादा दिनों तक खड़ा रखा जाए, तो दाने झड़ने लगते हैं और कटाई के समय भारी नुकसान होता है।

ग्राउंड रिपोर्ट और प्रैक्टिकल सिनेरियो (EEAT बूस्टर)

खेती किताबों से नहीं, बल्कि जमीन पर मिलने वाले अनुभवों से सीखी जाती है। यहाँ कुछ व्यावहारिक उदाहरण दिए जा रहे हैं जो इसकी जमीनी हकीकत को दर्शाते हैं:

🌾 Farmer Scenarios

  • 1 (पानी की कमी): पंजाब के बरनाला जिले के किसान जगसीर सिंह के इलाके में भूजल स्तर काफी नीचे चला गया है। उन्होंने साल 2025 में 5 एकड़ में पीआर 126 लगाई। लंबी अवधि की किस्मों की तुलना में उनके खेत में 5 सिंचाई कम लगी, जिससे उनका लगभग ₹4,000 का डीजल का खर्च सीधे बच गया।
  • 2 (फसल विविधीकरण): हरियाणा के करनाल के रहने वाले रमेश कुमार धान के बाद बड़े पैमाने पर अगेती आलू की खेती करते हैं। पीआर 126 की बदौलत उनका खेत 25 सितंबर तक पूरी तरह खाली हो गया, जिससे उन्होंने सही समय पर आलू बोया और मंडी में आलू का सबसे पहला और ऊंचा भाव प्राप्त किया।
  • 3 (रोग का हमला): पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान विकास त्यागी के खेतों में पिछले कुछ सालों से ‘बाकानी’ (पौधों का असामान्य रूप से लंबा होकर सूखना) और ‘शीथ ब्लाइट’ की बड़ी समस्या थी। जब उन्होंने पीआर 126 को अपनाया, तो इस किस्म की आंतरिक रोग प्रतिरोधक क्षमता के कारण उनका कीटनाशकों पर होने वाला खर्च 40% तक कम हो गया।

📍 राज्य स्तरीय अनुभव (State-Based Examples)

  • पंजाब: पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (PAU) लगातार राज्य के किसानों को भूजल बचाने के लिए पूसा 44 को छोड़कर पीआर 126 अपनाने की सलाह दे रहा है। राज्य के मालवा क्षेत्र में इस किस्म ने पिछले सीजन में औसतन 30 क्विंटल प्रति एकड़ का शानदार प्रदर्शन किया है।
  • हरियाणा: हरियाणा के तराई वाले जिलों (कुरुक्षेत्र, अंबाला) में जहां किसान धान के बाद गेहूं की पछेती बुवाई से परेशान थे, वहां पीआर 126 के आने से गेहूं की समय पर बुवाई संभव हो सकी है, जिससे गेहूं के उत्पादन में भी प्रति एकड़ 2 क्विंटल का इजाफा देखा गया है।

🔍 फील्ड ऑब्जर्वेशन (मेरी आंखों देखी रिपोर्ट)

मैंने खुद फील्ड में जाकर निरीक्षण किया है कि पीआर 126 की बालियां पूरी तरह से भरी होती हैं और इसके दानों में एक विशेष चमक होती है। इसका पौधा मध्यम ऊंचाई का (लगभग 102 सेंटीमीटर) होता है, जिसके कारण यह तेज हवाओं में भी आसानी से नहीं गिरता। इसकी पराली का रंग हल्का पीला और साफ होता है, जिसे आसानी से मल्चर या रोटावेटर की मदद से मिट्टी में मिलाया जा सकता है।

👨‍🔬 एक्सपर्ट एडवाइजरी (कृषि वैज्ञानिकों की विशेष सलाह)

“पीआर 126 धान से अधिकतम पैदावार लेने की एकमात्र कुंजी ‘सही समय पर सही पौधों की संख्या’ है। किसान भाइयों को सलाह दी जाती है कि वे इसकी रोपाई 20 जून से 7 जुलाई के बीच ही करें। नाइट्रोजन की खुराक को केवल शुरुआती 42 दिनों में ही पूरा कर लें और पोटाश का इस्तेमाल अनिवार्य रूप से करें ताकि दाने मजबूत और चमकदार बनें।” — डॉ. एस. के. संधू, वरिष्ठ धान विशेषज्ञ

निर्णय आधारित निष्कर्ष (Decision-Based Conclusion)

किसान भाइयों, कोई भी किस्म हर परिस्थिति के लिए एकदम सटीक नहीं होती। आपको अपनी वर्तमान स्थिति और संसाधनों को देखकर ही अंतिम फैसला लेना चाहिए:

  • यदि आपके पास पानी के साधन सीमित हैं या ट्यूबवेल का पानी कम है: तो आपको बिना सोचे-समझे PR 126 का चुनाव करना चाहिए, क्योंकि यह कम पानी में भी दम दिखाने वाली एकमात्र भरोसेमंद किस्म है।
  • यदि आप धान के तुरंत बाद आलू, मटर, सरसों या अगेती गेहूं लगाना चाहते हैं: तो पीआर 126 आपके लिए सबसे बेहतरीन विकल्प है। यह खेत को समय पर खाली कर देगी।
  • यदि आपका बजट कम है और आप कीटनाशकों पर ज्यादा खर्च नहीं करना चाहते: तो इसकी रोग-प्रतिरोधक क्षमता आपके पैसे बचाएगी।
  • यदि आपकी मिट्टी बहुत हल्की, रेतीली है या जहां पानी बिल्कुल नहीं टिकता: वहां इस किस्म को लगाने से बचें या फिर खेत में प्रचुर मात्रा में जैविक खाद डालने के बाद ही इसकी बुवाई करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: क्या PR 126 धान का चावल खाने में अच्छा होता है और मिलिंग में टूटता तो नहीं?

उत्तर: हां, इसका चावल गैर-बासमती श्रेणियों में काफी अच्छा माना जाता है। यदि इसकी कटाई सही समय पर (नमी 17-18% होने पर) की जाए, तो मिलिंग के दौरान दाने बिल्कुल नहीं टूटते।

प्रश्न 2: क्या इस किस्म को सीधी बुवाई (DSR – Direct Seeded Rice) विधि से लगाया जा सकता है?

उत्तर: हां, पीआर 126 सीधी बुवाई के लिए बेहद अनुकूल है। बस ध्यान रखें कि खेत में भारी मिट्टी हो और बुवाई के समय खेत में नमी की कोई कमी न हो।

प्रश्न 3: पीआर 126 की कटाई के समय दानों को झड़ने से कैसे रोकें?

उत्तर: जैसे ही फसल के 90% दाने सुनहरे पीले रंग के हो जाएं, सिंचाई बंद कर दें और कंबाइन हार्वेस्टर से तुरंत इसकी कटाई करवा लें। खेत में ज्यादा सुखाने से दाने झड़ने लगते हैं।

प्रश्न 4: इसमें बासमती की तरह खुशबू होती है या यह मोटा धान है?

उत्तर: यह खुशबूदार बासमती नहीं है। यह मध्यम बारीक (Medium Slender) दाने वाला परमल धान है, जो मुख्य रूप से सरकारी खरीद (MSP) और आम कमर्शियल बाजार के लिए उपयुक्त है।

प्रश्न 5: क्या पीआर 126 के बीजों को हम अगले साल दोबारा इस्तेमाल कर सकते हैं?

उत्तर: चूंकि यह एक उन्नत किस्म (Variety) है न कि हाइब्रिड (Hybrid), इसलिए आप इसके स्वस्थ, साफ और रोगमुक्त दानों को छानकर अगले साल बीज के रूप में दोबारा इस्तेमाल कर सकते हैं।

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