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Pusa 1847 Dhan Variety Full Guide: पैदावार और विशेषताएं की पूरी जानकारी

क्या आप भी हर साल धान की खेती में महंगी से महंगी फंगीसाइड और दवाइयां छिड़क कर परेशान हो चुके हैं? क्या पत्ता झुलसा (Blight) और झोंका रोग (Blast) जैसी खतरनाक बीमारियां आपकी फसल की पैदावार को ऐन वक्त पर आधा कर देती हैं? हमारे देश के लाखों किसान भाइयों की सबसे बड़ी सिरदर्दी यही है कि वे बासमती धान की प्रीमियम वैरायटियां तो लगाना चाहते हैं, लेकिन इन बीमारियों के डर से पीछे हट जाते हैं।

अगर धान पकते समय खेत में झुलसा रोग आ जाए, तो चावल की क्वालिटी खराब हो जाती है और मंडियों में उसका रेट सीधे मिट्टी के भाव मिलता है। लेकिन अब आपको बिल्कुल भी चिंता करने की जरूरत नहीं है। दिल्ली के पूसा संस्थान (IARI) के कृषि वैज्ञानिकों ने बासमती उत्पादक किसानों की इस सबसे बड़ी समस्या का एक अचूक तोड़ निकाल लिया है।

हम बात कर रहे हैं एक ऐसी नई और एडवांस वैरायटी की, जिसमें झुलसा और झोंका रोग जैसी बीमारियां बिल्कुल नहीं लगतीं और यह कम खर्च में बंपर मुनाफा देती है। आज इस Pusa 1847 Dhan Variety Full Guide में, मैं आपको इस वैरायटी की हर छोटी-बड़ी खासियत, पकने के सटीक दिन, प्रति एकड़ होने वाली असली पैदावार और इसे लगाने के सबसे बेस्ट तरीकों के बारे में बिल्कुल विस्तार से बताऊंगा।

पूसा 1847 धान वैरायटी आखिर क्या है और इसे क्यों बनाया गया?

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI), नई दिल्ली द्वारा विकसित की गई पूसा बासमती 1847 असल में भारत की सबसे मशहूर और लोकप्रिय अगेती किस्म ‘पूसा बासमती 1509’ का ही एक सुधरा हुआ और अत्यधिक आधुनिक रूप है। यह किस्म बासमती धान की खेती में एक नया मील का पत्थर साबित हो रही है।

दरअसल, पूसा 1509 वैरायटी कम समय में पकने और शानदार खुशबू के लिए जानी जाती थी, लेकिन पिछले कुछ सालों से उसमें ‘बैक्टिरियल लीफ ब्लाइट’ (पत्ता झुलसा रोग) और ‘ब्लास्ट’ (झोंका रोग) का हमला बहुत ज्यादा बढ़ गया था। इसके कारण किसानों को फसल बचाने के लिए हर हफ्ते महंगी रासायनिक दवाइयों का छिड़काव करना पड़ता था, जिससे लागत आसमान छूने लगी थी।

वैज्ञानिकों ने आणविक प्रजनन (Molecular Breeding) तकनीक का इस्तेमाल करके पूसा 1509 के मूल गुणों में बदलाव किए बिना, उसमें बीमारियों से लड़ने वाले दो विशेष जींस शामिल कर दिए। इसका नतीजा यह हुआ कि पूसा 1847 पूरी तरह से रोग-प्रतिरोधक (Resistant) बन गई। अब इस फसल पर इन दोनों बीमारियों का असर बिल्कुल शून्य होता है, जिससे किसानों का दवाइयों का पूरा खर्च बच जाता है।

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पूसा 1847 धान की मुख्य विशेषताएं और पकने की अवधि

इस वैरायटी को अपने खेत में लगाने से पहले आपको इसकी शारीरिक बनावट, इसकी ताकत और इसके स्वभाव को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए। आइए बात करते हैं इसकी उन खासियतों की जो इसे आज के समय की सबसे हॉट वैरायटी बनाती हैं:

1. पकने की सटीक समयावधि (Maturity Window)

यह एक कम समय लेने वाली अगेती (Early) बासमती किस्म है। नर्सरी में बीज बोने से लेकर फसल के पूरी तरह पककर कटने तक इसमें मात्र 120 से 125 दिन का समय लगता है। अगर हम मुख्य खेत में रोपाई के बाद की बात करें, तो यह मात्र 95 से 100 दिनों में कटाई के लिए बिल्कुल तैयार हो जाती है।

2. पौधे की लंबाई और मजबूती

इसके पौधे की ऊंचाई मध्यम होती है, जो लगभग 110 से 115 सेंटीमीटर तक जाती है।

  • मजबूत तना: इसका तना पूसा 1509 के मुकाबले कहीं ज्यादा मजबूत और कड़ा होता है।
  • हवा-बारिश में सुरक्षित: तना मजबूत होने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि सितंबर महीने में आने वाली तेज हवाओं और भारी बारिश के बावजूद इसके पौधे खेत में नीचे नहीं गिरते (No Lodging)। फसल सीधी खड़ी रहने से दानों का नुकसान नहीं होता।

3. दाने की चमक और वर्ल्ड-क्लास क्वालिटी

पूसा 1847 के चावल की क्वालिटी अंतरराष्ट्रीय स्तर की है। इसके दाने काफी लंबे, पतले और बेहद चमकदार होते हैं।

  • बेहतरीन खुशबू: पकते समय इसके दानों से बासमती की वही पारंपरिक और लाजवाब खुशबू निकलती है जो ग्राहकों को आकर्षित करती है।
  • टूटने की समस्या नहीं: राइस मिलिंग के समय इसके चावल में टूटने (Broken Rice) की समस्या बहुत कम देखी गई है। पकने के बाद इसका दाना बिल्कुल खिला-खिला और नॉन-स्टिकी (बिना चिपका हुआ) रहता है।

पूसा 1847 धान की पैदावार का पूरा गणित (Yield Metrics)

अब बात करते हैं उस सबसे जरूरी आंकड़े की, जिसका हर किसान भाई को बेसब्री से इंतजार रहता है—”भाई, यह वैरायटी प्रति एकड़ कितना क्विंटल का झाड़ देती है?”

चूंकि यह एक बीमारी-रहित किस्म है, इसलिए इसकी पैदावार में अचानक होने वाली गिरावट का खतरा बिल्कुल खत्म हो जाता है। अगर हम खेतों के वास्तविक और जमीनी अनुभवों की बात करें, तो इसके पैदावार के आंकड़े कुछ इस प्रकार हैं:

  • औसत पैदावार (Average Yield): सामान्य देखरेख और संतुलित खाद-पानी के साथ यह वैरायटी बहुत आराम से 24 से 26 क्विंटल प्रति एकड़ तक का उत्पादन दे देती है।
  • अधिकतम पैदावार (Maximum Potential): अगर आपकी मिट्टी उपजाऊ दोमट या भारी है, और आपने सही समय पर रोपाई करके अच्छा मैनेजमेंट किया है, तो यह किस्म 28 से 30 क्विंटल प्रति एकड़ तक का बंपर झाड़ देने की पूरी क्षमता रखती है।

पूसा 1847 बनाम पूसा 1509 और पूसा 1692 (Comparison Table)

आइए मार्केट की अन्य दो सबसे बड़ी अगेती बासमती किस्मों के साथ इसका सीधा मुकाबला करके देखते हैं ताकि आपके मन में कोई उलझन न रहे:

फीचर्स और गुणपूसा बासमती 1847पूसा बासमती 1509पूसा बासमती 1692
पकने का कुल समय120 – 125 दिन115 – 120 दिन110 – 115 दिन
औसत पैदावार (प्रति एकड़)24 – 26 क्विंटल20 – 22 क्विंटल25 – 27 क्विंटल
पत्ता झुलसा रोग (Blight)100% सुरक्षित (Resistant)अत्यधिक संवेदनशील (High Risk)संवेदनशील (Moderate Risk)
झोंका रोग (Blast)100% सुरक्षित (Resistant)अत्यधिक संवेदनशील (High Risk)संवेदनशील (Moderate Risk)
तना गिरने की समस्यान के बराबर (मजबूत तना)बहुत ज्यादा (कमजोर तना)कम

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पूसा 1847 से रिकॉर्ड तोड़ पैदावार पाने के 5 व्यावहारिक स्टेप्स

अगर आप इस सीजन में पूसा 1847 से अपनी उम्मीद से ज्यादा पैदावार निकालना चाहते हैं, तो नर्सरी से लेकर कटाई तक नीचे दिए गए इन पांच स्टेप्स का पालन बिल्कुल कड़ाई से करें:

स्टेप 1: नर्सरी (पौध) तैयार करने का सही समय

कम अवधि की वैरायटी होने के कारण इसकी नर्सरी डालने का सबसे बेस्ट समय 20 मई से 15 जून के बीच माना जाता है। प्रति एकड़ खेत की रोपाई के लिए आपको लगभग 5 से 6 किलोग्राम साफ और स्वस्थ बीज की जरूरत होगी। बीज बोने से पहले उसे कवकनाशी दवा से उपचारित जरूर कर लें।

स्टेप 2: सही उम्र की पौध की रोपाई (Age of Seedlings)

पूसा 1847 के साथ सबसे जरूरी नियम यह है कि जब आपकी नर्सरी 21 से 25 दिन की हो जाए, तो तुरंत उसकी रोपाई मुख्य खेत में कर दें। अगर पौध 30 दिन से ज्यादा पुरानी हो जाएगी, तो खेत में कल्ले (Tillers) बहुत कम निकलेंगे, जिससे सीधे तौर पर आपकी पैदावार घट जाएगी।

स्टेप 3: रोपाई के समय पौधों की सटीक दूरी

खेत तैयार करते समय प्रति एकड़ अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद जरूर मिलाएं। रोपाई करते समय पौधे से पौधे की दूरी 15 सेंटीमीटर और लाइन से लाइन की दूरी 20 सेंटीमीटर रखें। हर एक जगह (Hill) पर कम से कम 2 से 3 स्वस्थ पौधों को एक साथ लगाएं ताकि आगे चलकर कल्लों का भारी गुच्छा तैयार हो सके।

स्टेप 4: संतुलित खाद प्रबंधन (Fertilizer Schedule)

बासमती धान में अंधाधुंध यूरिया डालना सबसे आत्मघाती कदम है। यूरिया की ज्यादा मात्रा से पौधे कोमल हो जाते हैं और उन पर कीड़ों का हमला बढ़ जाता है। प्रति एकड़ खेत में नीचे दी गई तालिका के अनुसार ही खाद का इस्तेमाल करें:

  • बुवाई/रोपाई के समय: 1 बैग एनपीके (NPK 12:32:16) या 50 किलो डीएपी (DAP) + 20 किलो पोटाश (MOP)।
  • रोपाई के 20-25 दिन बाद: 35 से 40 किलो यूरिया + 5 किलो जिंक सल्फेट (21%)।
  • रोपाई के 40-45 दिन बाद (गोभ की अवस्था से पहले): 30 किलो यूरिया का आखिरी टॉप ड्रेसिंग करें।

स्टेप 5: पानी और खरपतवार का सही कंट्रोल

रोपाई के शुरुआती 15 दिनों तक खेत में 2 से 3 इंच पानी हमेशा भरा रहना चाहिए ताकि पौधे मिट्टी में अपनी पकड़ बना सकें और खरपतवार न उगें। खरपतवार रोकने के लिए रोपाई के 3 दिनों के भीतर प्रेटिलाक्लोस या बुटाक्लोर जैसी प्री-इमर्जेंस दवा का इस्तेमाल पानी में मिलाकर करें। फसल के 50 दिन के होने के बाद खेत में लगातार पानी भरने के बजाय ‘गीला-सूखा’ (Alternate Wetting & Drying) चक्र अपनाएं, इससे जड़ें बहुत मजबूत होती हैं।

इस वैरायटी में कीड़ों से बचाव के सरल उपाय (Pest Management)

यूं तो पूसा 1847 में फंगस और बैक्टीरिया वाली मुख्य बीमारियां (झुलसा और झोंका) बिल्कुल नहीं आती हैं, लेकिन कोमल और खुशबूदार पत्तियां होने के कारण कुछ रसचूसक और चबाने वाले कीड़ों का हमला हो सकता है:

  • तना छेदक (Stem Borer) और पत्ती लपेटक (Leaf Folder): अगर आपको खेत में सफेद बालियां या मुड़ी हुई पत्तियां दिखाई दें, तो समझें कि सुंडी का हमला हुआ है। इससे बचाव के लिए रोपाई के 25-30 दिन बाद खेत में फर्टेरा (Chlorantraniliprole 0.4% GR) 4 किलो प्रति एकड़ के हिसाब से बालू रेत में मिलाकर बिखेर दें।
  • हॉपर या भूरा माहो (BPH): धान के पकने के समय पौधों के निचले हिस्से (तने के पास) में काले या भूरे रंग के छोटे कीड़े जमा हो जाते हैं। अगर इनका हमला दिखे, तो तुरंत खेत का पानी बाहर निकालें और पाइमेट्रोजिन या डिनोटेफ्यूरॉन जैसी सही दवा का स्प्रे सीधे पौधों के तनों पर करें।

निष्कर्ष: इस बार समझदारी चुनें और अपनी लागत घटाएं

पूसा 1847 धान की खेती करना आज के समय में ट्रेडिशनल फार्मिंग से ऊपर उठकर एक घाटे से मुनाफे की तरफ जाने वाला बिजनेस है। यह वैरायटी आपको न सिर्फ फंगीसाइड दवाओं के भारी-भरकम खर्च से पूरी आजादी देती है, बल्कि अपनी शानदार क्वालिटी के दम पर मंडियों में सबसे टॉप का रेट भी सुनिश्चित करती है। 120 दिनों का इसका छोटा जीवन चक्र आपको अगली फसलों के लिए भी पूरा समय देता है।

अगर आप इस बार सही समय पर स्वस्थ नर्सरी लगाकर और संतुलित यूरिया के इस्तेमाल के साथ पूसा 1847 की खेती करते हैं, तो आपकी बंपर पैदावार और भारी बचत को कोई नहीं रोक सकता।

आपका अगला कदम: क्या आप इस सीजन में अपने खेतों में पूसा 1847 धान लगाने जा रहे हैं? या बीज को लेकर आपके मन में कोई और सवाल है? नीचे कमेंट सेक्शन में अपने जिले और राज्य के नाम के साथ हमसे जरूर पूछें, ताकि हम आपके इलाके के मौसम के हिसाब से आपको सबसे बेस्ट गाइडेंस दे सकें। इस काम की पोस्ट को अपने साथी किसान भाइयों के साथ वाट्सएप (WhatsApp) ग्रुप्स में शेयर करना बिल्कुल न भूलें!

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

Q1. पूसा 1847 धान की वैरायटी को पकने में कुल कितना समय लगता है?

जवाब: यह एक अगेती किस्म है जो बीज बोने से लेकर पूरी तरह पकने तक कुल 120 से 125 दिन का समय लेती है। मुख्य खेत में रोपाई के बाद यह मात्र 95 से 100 दिनों में कट जाती है।

Q2. क्या पूसा 1847 में पत्ता झुलसा (Blight) और झोंका रोग (Blast) बिल्कुल नहीं लगता?

जवाब: हां, इस वैरायटी को जेनेटिक रूप से इन दोनों बीमारियों के प्रति पूरी तरह रोग-प्रतिरोधक (Resistant) बनाया गया है। इसलिए इस फसल में इन दोनों रोगों के लिए किसी भी फंगीसाइड स्प्रे की जरूरत नहीं पड़ती।

Q3. प्रति एकड़ खेत की रोपाई के लिए कितने किलोग्राम पूसा 1847 के बीज की जरूरत होती है?

जवाब: एक एकड़ खेत में मानक दूरी पर रोपाई करने के लिए 5 से 6 किलोग्राम प्रमाणित बीज की नर्सरी तैयार करना बिल्कुल पर्याप्त और उत्तम माना जाता है।

Q4. क्या पूसा 1847 धान की कटाई कंबाइन हार्वेस्टर से की जा सकती है?

जवाब: हां, इसका तना बहुत मजबूत और कड़ा होता है जिसकी वजह से पौधे बिल्कुल सीधे खड़े रहते हैं। इसलिए कंबाइन हार्वेस्टर से इसकी कटाई बिना दानों के नुकसान के बेहद आसानी से हो जाती है।

Q5. मंडी में पूसा 1847 धान का रेट पूसा 1509 के बराबर मिलता है या कम?

जवाब: इसके दानों की लंबाई, मोटाई और खुशबू हूबहू पूसा 1509 जैसी ही होती है, इसलिए मंडियों में इसका रेट बिलकुल पूसा 1509 के बराबर या उससे बेहतर ही मिलता है।

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