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सोयाबीन में एरियल ब्लाइट: बारिश बाद पहचान व नियंत्रण

लगातार बारिश के बाद सोयाबीन की फसल देखने में हरी-भरी लग सकती है, लेकिन पौधों की घनी पत्तियों के अंदर बीमारी चुपचाप बढ़ रही होती है। ऊपर से सब सामान्य दिखता है। जब पत्तियां हटाकर अंदर देखते हैं, तब पानी में भीगे जैसे भूरे धब्बे, चिपकी हुई पत्तियां और उनके बीच महीन जाला नजर आता है।

ऐसे लक्षण मिलें तो इन्हें सामान्य पत्ती सूखना समझकर छोड़ना ठीक नहीं होगा। ये सोयाबीन में एरियल ब्लाइट के संकेत हो सकते हैं।

इस रोग की एक खास बात है—अनुकूल मौसम मिलते ही यह खेत के छोटे हिस्से से आसपास के पौधों में तेजी से फैल सकता है। इसलिए पहचान जितनी जल्दी होगी, नियंत्रण उतना ही आसान रहेगा।

लेकिन यहां एक गलती नहीं करनी है। केवल बारिश हुई है, इसलिए फफूंदनाशी डाल देना सही तरीका नहीं है। पहले खेत देखें, लक्षण पहचानें और उसके बाद ही उपचार का फैसला करें।

सोयाबीन में एरियल ब्लाइट क्या है?

एरियल ब्लाइट सोयाबीन में लगने वाला एक फफूंदजनित रोग है। इसे राइजोक्टोनिया एरियल ब्लाइट और वेब ब्लाइट के नाम से भी जाना जाता है। यह मुख्य रूप से Rhizoctonia solani नामक फफूंद के कारण होता है।

यह फफूंद मिट्टी और संक्रमित फसल अवशेषों में जीवित रह सकती है। जैसे ही लगातार नमी, गर्म मौसम और घनी फसल जैसी अनुकूल परिस्थितियां मिलती हैं, इसका कवक-जाल पौधों पर फैलना शुरू कर देता है।

शुरुआत कई बार पौधे के निचले या बीच वाले हिस्से से होती है। धीरे-धीरे पत्तियां, डंठल, तना और फलियां भी प्रभावित हो सकती हैं।

संक्रमित पत्तियां आपस में चिपक जाती हैं और उनके बीच जाले जैसी फफूंद दिखाई देने लगती है। इसी जालीनुमा बनावट के कारण इसे वेब ब्लाइट कहा जाता है।

बारिश के बाद यह रोग क्यों बढ़ता है?

बारिश के बाद एरियल ब्लाइट का खतरा बढ़ने की मुख्य वजह सिर्फ पानी नहीं, बल्कि पत्तियों का लंबे समय तक गीला रहना है।

लगातार बारिश और बादलों के कारण खेत में धूप कम पहुंचती है। घनी फसल के अंदर हवा भी ठीक से नहीं चल पाती। नतीजा यह होता है कि पौधों की निचली और बीच की पत्तियां काफी समय तक नम रहती हैं।

फफूंद को बढ़ने के लिए यही माहौल चाहिए।

इन परिस्थितियों में एरियल ब्लाइट का खतरा ज्यादा रह सकता है:

  • लगातार या रुक-रुककर बारिश होना
  • खेत में पानी का रुकना
  • पत्तियों का लंबे समय तक गीला रहना
  • जरूरत से अधिक घनी फसल होना
  • खरपतवार के कारण हवा का आवागमन कम होना
  • खेत में संक्रमित फसल अवशेष मौजूद रहना
  • पिछले वर्षों में भी रोग का प्रकोप होना
  • खेत के निचले हिस्से में ज्यादा नमी रहना

Rhizoctonia solani मिट्टी और पुराने पौध अवशेषों में कठोर संरचनाओं के रूप में जीवित रह सकती है। गर्म और गीले मौसम में इसका कवक-जाल पौधों की सतह पर फैलकर पत्तियों को आपस में चिपका देता है। यही रोग-विकास क्रम University of Arkansas Extension ने भी बताया है।

एरियल ब्लाइट की सही पहचान कैसे करें?

इस रोग को पकड़ने के लिए केवल ऊपर से खेत देखकर लौटना काफी नहीं है। पौधों की पत्तियां हटाकर अंदर का हिस्सा भी देखना पड़ेगा। असली लक्षण अक्सर वहीं मिलते हैं।

पानी में भीगे जैसे धब्बे

शुरुआती अवस्था में पत्तियों पर पानी में भीगे जैसे धूसर-हरे या हरे-भूरे धब्बे दिखाई दे सकते हैं।

ये धब्बे सामान्य पीलापन या खाद की कमी से बनने वाले लक्षणों जैसे नहीं होते। संक्रमित हिस्सा गीला, फीका और कुछ हद तक पारदर्शी जैसा भी दिख सकता है।

धब्बों का लाल-भूरा होना

रोग बढ़ने पर यही धब्बे हरे-भूरे से लाल-भूरे रंग में बदलने लगते हैं। कुछ समय बाद प्रभावित हिस्सा हल्का भूरा, गहरा भूरा या लगभग काला हो सकता है।

कई धब्बे आपस में मिल जाएं तो पत्ती का बड़ा हिस्सा एक साथ झुलसा हुआ नजर आता है।

पत्तियों का आपस में चिपकना

अधिक नमी में संक्रमित पत्तियां पास वाली पत्तियों से चिपक जाती हैं। खेत में ऐसे पौधे दबे, सिकुड़े या अचानक झुलसे हुए दिख सकते हैं।

यह लक्षण खासकर घनी फसल के अंदर ज्यादा साफ दिखाई देता है।

सफेद या धूसर जाला

पत्तियों को हल्के से अलग करने पर उनके बीच सफेद या धूसर रंग का महीन जाला दिखाई दे सकता है। यह फफूंद का कवक-जाल होता है और एरियल ब्लाइट पहचानने का सबसे उपयोगी संकेत है।

हालांकि तेज धूप या सूखे मौसम में यह जाला बहुत साफ दिखाई नहीं देता। इसलिए बारिश रुकने और पत्तियों से अतिरिक्त पानी सूखने के बाद खेत की जांच करना बेहतर रहता है।

छोटी भूरी संरचनाएं

संक्रमित पत्तियों और डंठलों पर छोटी, गहरे भूरे रंग की कठोर संरचनाएं भी बन सकती हैं। इन्हें स्क्लेरोशिया कहा जाता है।

इन्हीं संरचनाओं की मदद से फफूंद प्रतिकूल मौसम में मिट्टी या फसल अवशेषों के अंदर जीवित रह सकती है।

तने और फलियों पर संक्रमण

गंभीर अवस्था में रोग पत्तियों तक सीमित नहीं रहता। पत्ती के डंठल, तना और फलियां भी प्रभावित हो सकती हैं।

फलियों पर संक्रमण होने से दानों का विकास और गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। ज्यादा संक्रमण में पत्तियां समय से पहले सूखने लगती हैं, जिससे पौधे की भोजन बनाने की क्षमता कम हो जाती है।

इन लक्षणों की पुष्टि Tamil Nadu Agricultural University और NC State Extension की रोग-पहचान जानकारी से भी होती है।

खेत में एरियल ब्लाइट जांचने का आसान तरीका

खेत की जांच करने में बहुत समय नहीं लगता, बस सही जगह देखनी होती है।

  1. खेत के निचले, घने और ज्यादा नमी वाले हिस्से से शुरुआत करें।
  2. केवल ऊपर की पत्तियां नहीं, पौधे के बीच और नीचे की पत्तियां भी देखें।
  3. पानी में भीगे जैसे धब्बे और लाल-भूरे सूखे हिस्से खोजें।
  4. चिपकी हुई पत्तियों को धीरे से अलग करके जालीनुमा फफूंद देखें।
  5. जिस हिस्से में लक्षण मिले, उसकी साफ फोटो लें।
  6. पहचान स्पष्ट न हो तो फोटो या पौधे का नमूना कृषि विशेषज्ञ को दिखाएं।

सिर्फ एक-दो पुराने भूरे धब्बे मिलना एरियल ब्लाइट की पक्की पुष्टि नहीं है। चिपकी पत्तियां, पानी जैसे धब्बे और जालीनुमा कवक एक साथ दिखाई दें तो संदेह मजबूत होता है।

एरियल ब्लाइट या कोई दूसरी समस्या?

बारिश के बाद सोयाबीन में कई समस्याएं एक जैसी दिख सकती हैं। यहीं किसान अक्सर भ्रमित हो जाते हैं।

समस्याआम तौर पर दिखने वाली पहचान
एरियल ब्लाइटपानी में भीगे जैसे धब्बे, चिपकी पत्तियां, जालीनुमा कवक और भूरे स्क्लेरोशिया
एन्थ्रेक्नोजतने, डंठल और फलियों पर गहरे धब्बे तथा छोटी काली कवकीय संरचनाएं
जीवाणुजनित पत्ती रोगछोटे कोणीय या पीले-भूरे धब्बे, लेकिन सामान्यतः जालीनुमा कवक नहीं
पानी भरने से नुकसानखेत के निचले हिस्से में समान पीलापन, कमजोर जड़ें और रुकी हुई बढ़वार
स्प्रे से झुलसनछिड़काव के बाद एक जैसे पैटर्न में दाग, लेकिन पत्तियों के बीच कवकीय जाला नहीं

कई बार एक ही खेत में दो समस्याएं साथ भी मिल सकती हैं। ऐसे में केवल फोटो देखकर फैसला करना मुश्किल हो जाता है। संदेह हो तो नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विभाग से रोग की पुष्टि कराएं।

रोग दिखाई देने पर सबसे पहले क्या करें?

खेत का रुका हुआ पानी निकालें

अगर खेत में कहीं पानी भरा है तो सबसे पहले उसकी निकासी करें। लंबे समय तक पानी खड़ा रहने से खेत में नमी बनी रहती है और पौधों की जड़ें भी कमजोर हो सकती हैं।

जल निकासी फफूंदनाशी का विकल्प नहीं है, लेकिन रोग के लिए अनुकूल वातावरण कम करने में मदद करती है।

संक्रमित हिस्से पर नजर रखें

जहां शुरुआती लक्षण मिले हैं, उस जगह को चिन्हित कर लें। अगले दो से तीन दिनों तक उसी हिस्से और आसपास के पौधों को देखते रहें।

इससे पता चलेगा कि रोग स्थिर है या तेजी से आगे बढ़ रहा है।

बहुत गीली फसल में बार-बार न चलें

बारिश के तुरंत बाद गीली फसल में बार-बार चलना ठीक नहीं है। पत्तियां आपस में रगड़ती हैं और संक्रमित पौध सामग्री दूसरे हिस्सों तक पहुंच सकती है।

निरीक्षण और स्प्रे पत्तियों से अतिरिक्त पानी सूखने के बाद करें।

लक्षण मिलने पर समय से छिड़काव करें

एरियल ब्लाइट के लक्षण साफ दिखाई देने के बाद ज्यादा इंतजार करना नुकसान बढ़ा सकता है। मौसम अनुकूल मिलते ही अनुशंसित फफूंदनाशी का छिड़काव करें।

स्प्रे के बाद कितने घंटे बारिश नहीं होनी चाहिए, इसकी एक तय अवधि सभी उत्पादों पर लागू नहीं होती। सही rain-free interval उत्पाद के लेबल पर देखें और छिड़काव से पहले मौसम पूर्वानुमान जरूर जांच लें।

एरियल ब्लाइट के लिए अनुशंसित फफूंदनाशी

ICAR–Indian Institute of Soybean Research की 2025 किसान सलाह में लक्षण दिखाई देने पर ये विकल्प बताए गए हैं:

सक्रिय संघटक और formulationआधिकारिक मात्रा
Fluxapyroxad 167 g/L + Pyraclostrobin 333 g/L SC300 ग्राम प्रति हेक्टेयर
Pyraclostrobin 133 g/L + Epoxiconazole 50 g/L SE750 मिली प्रति हेक्टेयर
Pyraclostrobin 20% WG375–500 ग्राम प्रति हेक्टेयर

सीधी बात—इनमें से किसी एक विकल्प का इस्तेमाल करना है। सभी को एक साथ नहीं मिलाना है।

ICAR-NSRI की 30 जुलाई 2026 को अपडेट की गई जानकारी में भी Fluxapyroxad 167 g/L + Pyraclostrobin 333 g/L SC की 300 ग्राम प्रति हेक्टेयर मात्रा को एरियल ब्लाइट प्रबंधन पैकेज में शामिल किया गया है। आधिकारिक जानकारी ICAR-NSRI Significant Research Achievements पर उपलब्ध है।

दवा खरीदते समय केवल ब्रांड का नाम देखकर फैसला न करें। पैकेट या बोतल पर ये चीजें जरूर जांचें:

  • सोयाबीन फसल का नाम दर्ज हो
  • एरियल ब्लाइट या संबंधित लक्ष्य रोग दर्ज हो
  • सक्रिय संघटक और उसकी सांद्रता समान हो
  • formulation वही हो
  • उत्पाद का पंजीकरण वैध हो
  • प्रतीक्षा अवधि और सुरक्षा निर्देश दिए गए हों

एक ही ब्रांड नाम जैसे सुनाई देने वाले उत्पादों का formulation अलग हो सकता है। इसलिए मात्रा हमेशा सक्रिय संघटक और लेबल देखकर ही तय करें।

स्प्रे के लिए कितना पानी चाहिए?

घनी सोयाबीन में एरियल ब्लाइट अंदर की पत्तियों में छिपा रहता है। अगर बहुत कम पानी लेकर स्प्रे किया तो दवा ऊपर की पत्तियों पर रह जाएगी और अंदर संक्रमित हिस्से तक नहीं पहुंचेगी।

ICAR-NSRI की सलाह के अनुसार:

  • नैपसेक स्प्रेयर से लगभग 500 लीटर पानी प्रति हेक्टेयर
  • ट्रैक्टर चालित पावर स्प्रेयर से न्यूनतम लगभग 200 लीटर पानी प्रति हेक्टेयर

पानी की वास्तविक जरूरत पौधों की ऊंचाई, फसल के घनत्व, नोजल और स्प्रे मशीन के हिसाब से थोड़ी बदल सकती है।

उद्देश्य पत्तियों से घोल बहाना नहीं है। दवा की महीन और समान परत पौधों के अंदरूनी हिस्से तक पहुंचनी चाहिए।

15 या 25 लीटर पंप में कितनी दवा डालें?

हर खेत के लिए एक जैसी प्रति पंप मात्रा बताना सही नहीं होगा। वजह आसान है—एक किसान का 15 लीटर पंप 300 वर्गमीटर कवर करता है, तो दूसरे का वही पंप नोजल और चाल के कारण अलग क्षेत्र कवर कर सकता है।

सही सूत्र यह है:

प्रति टंकी दवा = प्रति हेक्टेयर मात्रा × एक टंकी से कवर क्षेत्रफल ÷ 10,000

पहले पंप में साफ पानी भरें। सामान्य गति और दबाव से तय क्षेत्र में स्प्रे करके देखें कि एक टंकी में कितना क्षेत्र कवर हुआ। उसी क्षेत्रफल के आधार पर दवा की मात्रा निकालें।

बिना कैलिब्रेशन के केवल अंदाज से प्रति पंप मात्रा डालने पर दवा कम या ज्यादा हो सकती है।

क्या इसके साथ कीटनाशक, बोरॉन या पोषक तत्व मिला सकते हैं?

कई बार समय बचाने के लिए फफूंदनाशी के साथ कीटनाशक, बोरॉन, अमीनो एसिड, टॉनिक या दूसरे पोषक तत्व मिला दिए जाते हैं। हर बार यह मिश्रण सुरक्षित हो, जरूरी नहीं।

मिश्रण तभी करें जब:

  • दोनों उत्पादों के लेबल पर इसकी अनुमति हो
  • दोनों उत्पाद सोयाबीन और मौजूदा फसल अवस्था के लिए पंजीकृत हों
  • पानी की गुणवत्ता और pH सही हो
  • कृषि विशेषज्ञ ने मिश्रण की संगतता की पुष्टि की हो
  • फसल पर झुलसन का जोखिम न हो

सिर्फ जार टेस्ट में घोल ठीक दिखाई देने का मतलब यह नहीं कि मिश्रण फसल के लिए पूरी तरह सुरक्षित और प्रभावी भी होगा।

बेहतर यही है कि बिना जरूरत पांच-छह चीजें एक टंकी में न मिलाएं।

छिड़काव करते समय ये सावधानियां रखें

  • दस्ताने, मास्क और पूरे शरीर को ढकने वाले कपड़े पहनें।
  • तेज हवा और कड़ी दोपहर में स्प्रे न करें।
  • बारिश शुरू होने से ठीक पहले छिड़काव न करें।
  • लेबल पर दी गई मात्रा से अधिक दवा न डालें।
  • बंद नोजल को मुंह से फूंककर साफ न करें।
  • बच्चों और पशुओं को दवा तथा स्प्रे वाले खेत से दूर रखें।
  • बचा हुआ घोल कुएं, तालाब या नहर में न डालें।
  • खाली पैकेट या बोतल का घरेलू उपयोग न करें।
  • कटाई से पहले लेबल पर दी गई प्रतीक्षा अवधि का पालन करें।

अगले मौसम में रोग का खतरा कैसे घटाएं?

फफूंदनाशी मौजूदा संक्रमण को संभालने का एक हिस्सा है। अगर खेत में हर साल यही समस्या आती है तो खेती के तरीके में भी कुछ बदलाव करने होंगे।

बेहतर जल निकासी रखें

जहां संभव हो, चौड़ी क्यारी-नाली या उपयुक्त रिज-फरो पद्धति अपनाएं। अतिरिक्त बारिश का पानी जल्दी निकल जाएगा तो खेत में लंबे समय तक नमी नहीं रहेगी।

जरूरत से ज्यादा घनी बुवाई न करें

उचित कतार दूरी और अनुशंसित बीज दर रखें। घनी फसल में हवा कम चलती है और पत्तियां देर तक गीली रहती हैं।

संक्रमित अवशेषों का प्रबंधन करें

कटाई के बाद रोगग्रस्त पौध अवशेषों का खेत में ढेर न लगाएं। स्थानीय परिस्थिति के अनुसार अवशेष प्रबंधन और गर्मी की गहरी जुताई अपनाई जा सकती है।

उपयुक्त और सहनशील किस्म चुनें

ICAR की सूची में कुछ सोयाबीन किस्मों को राइजोक्टोनिया एरियल ब्लाइट के प्रति प्रतिरोधी या मध्यम प्रतिरोधी बताया गया है।

फिर भी केवल रोग प्रतिरोध देखकर किस्म न चुनें। वह किस्म आपके जिले, मिट्टी, बुवाई समय और स्थानीय जलवायु के लिए अनुशंसित होनी चाहिए।

लगातार सोयाबीन लेने से बचें

जिस खेत में बीमारी का पुराना इतिहास है, वहां लगातार सोयाबीन लेने के बजाय कृषि विज्ञान केंद्र से उपयुक्त फसल चक्र तय कराएं।

Rhizoctonia के अलग-अलग समूह कई फसलों और खरपतवारों पर जीवित रह सकते हैं। इसलिए बिना स्थानीय जानकारी के किसी भी फसल को पूरी तरह गैर-पोषक मान लेना ठीक नहीं होगा।

बुवाई से पहले बीज उपचार

ICAR-NSRI की 2026 में अपडेट जानकारी में Thiophanate methyl + Azoxystrobin + Thiamethoxam के पंजीकृत संयोजन से 10 मिली प्रति किलोग्राम बीज उपचार को आगे के फफूंदनाशी कार्यक्रम के साथ प्रभावी पैकेज बताया गया है।

ध्यान रखें, यह बुवाई से पहले किया जाने वाला उपचार है। खड़ी फसल में इसका इस्तेमाल नहीं किया जाता।

सक्रिय संघटक, formulation और सोयाबीन के लिए लेबल दावे की पुष्टि किए बिना यह मात्रा किसी दूसरे उत्पाद पर लागू न करें।

इन आम गलतियों से बचें

  • सिर्फ बारिश देखकर कई फफूंदनाशी मिला देना
  • पत्तियां पूरी तरह काली होने तक इंतजार करना
  • प्रति पंप अनुमान से ज्यादा दवा डालना
  • बहुत कम पानी लेकर पूरा खेत स्प्रे कर देना
  • सिर्फ फसल के ऊपर वाले हिस्से पर दवा पहुंचाना
  • बिना जांच फफूंदनाशी, कीटनाशक और पोषक तत्व मिलाना
  • स्प्रे के तुरंत बाद बारिश की संभावना को नजरअंदाज करना
  • formulation देखे बिना केवल ब्रांड के आधार पर मात्रा तय करना
  • सुरक्षा उपकरण और प्रतीक्षा अवधि की अनदेखी करना

आखिर में जरूरी बात

बारिश के बाद सोयाबीन में पानी जैसे भूरे धब्बे, आपस में चिपकी पत्तियां और सफेद या धूसर जालीनुमा फफूंद दिखाई दे तो एरियल ब्लाइट का संदेह हो सकता है।

ऐसे में खेत का पानी निकालें, रोग की सही पहचान करें और ICAR द्वारा अनुशंसित फफूंदनाशी विकल्पों में से किसी एक का पर्याप्त पानी के साथ छिड़काव करें।

प्रति पंप अंदाज से मात्रा डालना, कई फफूंदनाशियों को मिलाना और कम पानी में स्प्रे करना नुकसानदायक साबित हो सकता है। अगर लक्षण स्पष्ट नहीं हैं तो फोटो और पौधे का नमूना लेकर कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विभाग से पुष्टि करा लें। थोड़ा समय इसमें लगेगा, लेकिन गलत दवा पर खर्च होने से बेहतर है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

सोयाबीन में एरियल ब्लाइट किस कारण होता है?

यह मुख्य रूप से Rhizoctonia solani नामक फफूंद के कारण होने वाला रोग है। गर्म, नम और लगातार गीला मौसम इसके विकास के लिए अनुकूल होता है।

इसकी सबसे साफ पहचान क्या है?

पानी में भीगे जैसे भूरे धब्बे, पत्तियों का आपस में चिपकना और उनके बीच सफेद या धूसर जालीनुमा कवक इसका प्रमुख संकेत है।

15 लीटर पंप में कितनी दवा डालनी चाहिए?

इसकी एक तय मात्रा सभी खेतों के लिए सही नहीं होगी। पहले पता करें कि एक पंप से कितना क्षेत्र कवर होता है। फिर प्रति हेक्टेयर अनुशंसित मात्रा के आधार पर प्रति टंकी मात्रा निकालें।

क्या फफूंदनाशी के साथ कीटनाशक मिला सकते हैं?

तभी मिलाएं जब दोनों उत्पादों के लेबल पर इसकी अनुमति हो और कृषि विशेषज्ञ ने संगतता की पुष्टि की हो। केवल एक बार में स्प्रे पूरा करने के लिए अनावश्यक मिश्रण न बनाएं।

क्या कुछ दिनों बाद दोबारा स्प्रे जरूरी है?

हर खेत में दोबारा स्प्रे जरूरी नहीं होता। रोग की प्रगति, मौसम, फसल की अवस्था और उत्पाद के लेबल पर दिए गए अंतराल को देखकर फैसला करें। बिना खेत देखे तय तारीख पर बार-बार एक ही फफूंदनाशी का प्रयोग न करें।

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Devendra Singh Thakur

Devendra Singh Thakur किसान, कृषि विषयों के लेखक एवं संस्थापक — Smart KisanDevendra Singh Thakur एक किसान, कृषि विषयों के लेखक और Smart Kisan के संस्थापक हैं। वे फसल प्रबंधन, बीज किस्मों, उर्वरक एवं सुरक्षित कीट-रोग प्रबंधन, कृषि मशीनरी और सरकारी कृषि योजनाओं से जुड़ी उपयोगी जानकारी सरल हिंदी में साझा करते हैं। लेख तैयार करते समय आधिकारिक कृषि संस्थानों, राज्य कृषि विश्वविद्यालयों, उत्पाद के स्वीकृत लेबल और सरकारी पोर्टलों को प्राथमिकता दी जाती है।

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